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Strophe Eins
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Ihr
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naht
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euch
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wieder,
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schwankende
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Gestalten,
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die
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früh
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sich
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einst
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dem
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trüben
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Blick
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gezeigt.
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Versuch
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ich
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wohl,
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euch
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diesmal
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festzuhalten?
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Fühl
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ich
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mein
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Herz
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noch
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jenem
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Wahn
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geneigt?
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Ihr
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drängt
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|
euch
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zu
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nun
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gut,
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so
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mögt
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ihr
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walten,
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Wie
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|
ihr
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aus
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Dunst
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und
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Nebel
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um
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mich
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steigt;
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Mein
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Busen
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fühlt
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sich
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jugendlich
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erschüttert
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Vom
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Zauberhauch,
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der
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euren
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Zug
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umwittert.
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Strophe Zwei
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Ihr
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bringt
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mit
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euch
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die
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Bilder
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froher
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Tage,
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Und
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manche
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liebe
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Schatten
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steigen
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auf;
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Gleich
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einer
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alten,
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halbverklungnen
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Sage
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Kommt
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erste
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Lieb
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und
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Freundschaft
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|
mit
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herauf;
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Der
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Schmerz
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wird
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neu,
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es
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wiederholt
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|
die
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Klage
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Des
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|
Lebens
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labyrinthisch
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irren
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|
Lauf,
|
|
Und
|
|
nennt
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|
die
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|
Guten,
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|
die,
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|
um
|
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schöne
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Stunden
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Vom
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Glück
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getäuscht,
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vor
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mir
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hinweggeschwunden.
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Strophe Drei
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Sie
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hören
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|
nicht
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|
die
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|
folgenden
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|
Gesänge,
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Die
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|
Seelen,
|
|
denen
|
|
ich
|
|
die
|
|
ersten
|
|
sang;
|
|
Zerstoben
|
|
ist
|
|
das
|
|
freundliche
|
|
Gedränge,
|
|
Verklungen,
|
|
ach!
|
|
der
|
|
erste
|
|
Wiederklang.
|
|
Mein
|
|
Lied
|
|
ertönt
|
|
der
|
|
unbekannten
|
|
Menge,
|
|
Ihr
|
|
Beifall
|
|
selbst
|
|
macht
|
|
meinem
|
|
Herzen
|
|
bang,
|
|
Und
|
|
was
|
|
sich
|
|
sonst
|
|
an
|
|
meinem
|
|
Lied
|
|
erfreuet,
|
|
Wenn
|
|
es
|
|
noch
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lebt,
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|
irrt
|
|
in
|
|
der
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|
Welt
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|
zerstreuet.
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|
Strophe Vier
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Und
|
|
mich
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|
ergreift
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|
ein
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längst
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|
entwöhntes
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|
Sehnen
|
|
Nach
|
|
jenem
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|
stillen,
|
|
ernsten
|
|
Geisterreich,
|
|
Es
|
|
schwebt
|
|
nun
|
|
in
|
|
unbestimmten
|
|
Tönen
|
|
Mein
|
|
lispelnd
|
|
Lied,
|
|
der
|
|
Äolsharfe
|
|
gleich,
|
|
Ein
|
|
Schauer
|
|
faßt
|
|
mich,
|
|
Träne
|
|
folgt
|
|
den
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|
Tränen,
|
|
Das
|
|
strenge
|
|
Herz,
|
|
es
|
|
fühlt
|
|
sich
|
|
mild
|
|
und
|
|
weich;
|
|
Was
|
|
ich
|
|
besitze,
|
|
seh
|
|
ich
|
|
wie
|
|
im
|
|
Weiten,
|
|
Und
|
|
was
|
|
verschwand,
|
|
wird
|
|
mir
|
|
zu
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|
Wirklichkeiten.
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