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Herr
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von
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Ribbeck
|
|
auf
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Ribbeck
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im
|
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Havelland,
|
|
|
|
|
|
|
|
Ein
|
|
Birnbaum
|
|
in
|
|
seinem
|
|
Garten
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|
stand,
|
|
|
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|
|
|
|
|
|
Und
|
|
kam
|
|
die
|
|
goldene
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|
Herbsteszeit
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|
|
|
|
|
Und
|
|
die
|
|
Birnen
|
|
leuchteten
|
|
weit
|
|
und
|
|
breit,
|
|
|
|
|
|
|
|
Da
|
|
stopfte,
|
|
wenn’s
|
|
Mittag
|
|
vom
|
|
Turme
|
|
scholl,
|
|
|
|
|
|
|
|
Der
|
|
von
|
|
Ribbeck
|
|
sich
|
|
beide
|
|
Taschen
|
|
voll,
|
|
|
|
|
|
|
|
Und
|
|
kam
|
|
in
|
|
Pantinen
|
|
ein
|
|
Junge
|
|
daher,
|
|
|
|
|
|
|
|
So
|
|
rief
|
|
er:
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|
„Junge,
|
|
wiste
|
|
’ne
|
|
Beer?“
|
|
|
|
|
|
|
|
Und
|
|
kam
|
|
ein
|
|
Mädel,
|
|
so
|
|
rief
|
|
er:
|
|
„Lütt
|
|
Dirn,
|
|
|
|
Kumm
|
|
man
|
|
röwer,
|
|
ick
|
|
hebb
|
|
’ne
|
|
Birn.“
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
So
|
|
ging
|
|
es
|
|
viel
|
|
Jahre,
|
|
bis
|
|
lobesam
|
|
|
|
|
|
|
|
Der
|
|
von
|
|
Ribbeck
|
|
auf
|
|
Ribbeck
|
|
zu
|
|
sterben
|
|
kam.
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|
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|
|
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|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
Er
|
|
fühlte
|
|
sein
|
|
Ende.
|
|
’s
|
|
war
|
|
Herbsteszeit,
|
|
|
|
|
|
|
|
Wieder
|
|
lachten
|
|
die
|
|
Birnen
|
|
weit
|
|
und
|
|
breit;
|
|
|
|
|
|
|
|
Da
|
|
sagte
|
|
von
|
|
Ribbeck:
|
|
„Ich
|
|
scheide
|
|
nun
|
|
ab.
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|
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|
|
|
Legt
|
|
mir
|
|
eine
|
|
Birne
|
|
mit
|
|
ins
|
|
Grab.“
|
|
|
|
|
|
|
|
Und
|
|
drei
|
|
Tage
|
|
drauf,
|
|
aus
|
|
dem
|
|
Doppeldachhaus,
|
|
|
|
|
|
|
|
Trugen
|
|
von
|
|
Ribbeck
|
|
sie
|
|
hinaus,
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
Alle
|
|
Bauern
|
|
und
|
|
Büdner
|
|
mit
|
|
Feiergesicht
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
Sangen
|
|
„Jesus
|
|
meine
|
|
Zuversicht“,
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
Und
|
|
die
|
|
Kinder
|
|
klagten,
|
|
das
|
|
Herze
|
|
schwer:
|
|
|
|
|
|
|
|
„He
|
|
is
|
|
dod
|
|
nu.
|
|
Wer
|
|
giwt
|
|
uns
|
|
nu
|
|
’ne
|
|
Beer?“
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
So
|
|
klagten
|
|
die
|
|
Kinder.
|
|
Das
|
|
war
|
|
nicht
|
|
recht -
|
|
|
|
|
|
Ach,
|
|
sie
|
|
kannten
|
|
den
|
|
alten
|
|
Ribbeck
|
|
schlecht;
|
|
|
|
|
|
|
|
Der
|
|
neue
|
|
freilich,
|
|
der
|
|
knausert
|
|
und
|
|
spart,
|
|
|
|
|
|
|
|
Hält
|
|
Park
|
|
und
|
|
Birnbaum
|
|
strenge
|
|
verwahrt.
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
Aber
|
|
der
|
|
alte,
|
|
vorahnend
|
|
schon
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
Und
|
|
voll
|
|
Misstrauen
|
|
gegen
|
|
den
|
|
eigenen
|
|
Sohn,
|
|
|
|
|
|
|
|
Der
|
|
wusste
|
|
genau,
|
|
was
|
|
damals
|
|
er
|
|
tat,
|
|
|
|
|
|
|
|
Als
|
|
um
|
|
eine
|
|
Birn‘
|
|
ins
|
|
Grab
|
|
er
|
|
bat,
|
|
|
|
|
|
Und
|
|
im
|
|
dritten
|
|
Jahr
|
|
aus
|
|
dem
|
|
stillen
|
|
Haus
|
|
|
|
|
|
Ein
|
|
Birnbaumsprössling
|
|
sprosst
|
|
heraus.
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
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|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
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|
|
|
|
|
|
Und
|
|
die
|
|
Jahre
|
|
gingen
|
|
wohl
|
|
auf
|
|
und
|
|
ab,
|
|
|
|
|
|
Längst
|
|
wölbt
|
|
sich
|
|
ein
|
|
Birnbaum
|
|
über
|
|
dem
|
|
Grab,
|
|
|
|
|
|
Und
|
|
in
|
|
der
|
|
goldenen
|
|
Herbsteszeit
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
Leuchtet’s
|
|
wieder
|
|
weit
|
|
und
|
|
breit.
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
Und
|
|
kommt
|
|
ein
|
|
Jung’
|
|
übern
|
|
Kirchhof
|
|
her,
|
|
|
|
|
|
|
|
So
|
|
flüstert’s
|
|
im
|
|
Baume:
|
|
„Wiste
|
|
’ne
|
|
Beer?“
|
|
|
|
|
|
|
|
Und
|
|
kommt
|
|
ein
|
|
Mädel,
|
|
so
|
|
flüstert’s:
|
|
„Lütt
|
|
Dirn,
|
|
|
|
|
|
Kumm
|
|
man
|
|
röwer,
|
|
ick
|
|
gew’
|
|
di
|
|
’ne
|
|
Birn.“
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
So
|
|
spendet
|
|
Segen
|
|
noch
|
|
immer
|
|
die
|
|
Hand
|
|
|
|
|
|
|
|
Des
|
|
von
|
|
Ribbeck
|
|
auf
|
|
Ribbeck
|
|
im
|
|
Havelland.
|
|
|
|
|
|
|
|